प्रस्तावना

1. हमारे देश में नाप- तौल की दाशमिक प्रणाली अपनाने के पूर्व एक रूपता नहीं थी, भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में नाप तौल की भिन्न-भिन्न प्रणालियां प्रचलित थी, तौलने के लिये बांटों के अलावा पत्थर, लोहे के टुकड़े तथा मापने के लिये तरह-तरह के माप उपयोग में लाये जाते थे, सबसे बड़ी बिडंबना तो यह थी कि न केवल प्रत्येक प्रदेश में वरन्‌ प्रत्येक जिले तक में विभिन्न वस्तुओं के लिये भिन्न-भिन्न नाप तौल का प्रयोग किया जाता था। इस विभिन्नता के कारण जनता के प्रत्येक वर्ग को नुकसान उठाना पड़ता था। अतएव केन्द्र शासन ने स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चावत ही दाशमिक प्रणाली को अंगीकार कर इस प्रणाली के बांट माप प्रचलित करने का निर्णय लिया।

2. दाशमिक प्रणाली हमारे लिये कोई नई प्रणाली नहीं थी। इस प्रणाली का जन्म भारत में ही हुआ था, क्योंकि गंग राजाओं के शासन काल में उत्कल प्रदेश में यह प्रणाली प्रचलित थी। भारत के ही प्रसिद्ध ज्योतिषी सदानंद आचार्य ने भी गृह नक्षत्रों के बीच का अन्तर निकालने के लिये दाशमिक पद्धति का ही सहारा लिया था। उड़ीसा में कोणार्क के प्रसिद्ध सूर्य मंदिर के निर्माण के समय उसके कारीगरों ने दशमहलव प्रणाली का ही उपयोग किया था, इससे प्रमाणित होता है कि मैट्रिक प्रणाली के उत्थान में भारत का पूर्व से ही योगदान रहा है। ''कौटिल्य का अर्थशास्त्रक'' के 19वें अध्याय से ''चातुर्याषिकं प्रति वेधानिक कारयते। अप्रति वित्स्यात्यय स्पादः स्पत विश्व तियणः।

'' English Translation- The balance & Weights should be examined at the interval of four months. Those who do not get examined at the scheduled time they should be awarded an economic punishment. “Qur-an Shareef (Aayat) No. 35 Surah 17 A” “Give full Measure when ye Measure & Weight, with a balance that is straight That is better & fairer in the final determination

3. दाशमिक प्रणाली एक वैज्ञानिक प्रणाली है। इस प्रणाली में तौल, लंबाई, नाप तथा द्रव पदार्थो को मापने के लिये जिन इकाईयों का प्रयोग होता है, उससे बड़ी या छोटी इकाई 10 के गुणांक में निकाली जा सकती है।

4. हमारे देश में दाशमिक प्रणाली का प्रारंभ वर्ष 1956 से किया गया, तथा इस उद्‌देश्य की पूर्ति हेतु भारत शासन ने 'स्टेण्डर्ड ऑफ वेट्‌स एंड मेजर्स एक्ट 1956' लागू किया। म0प्र0 में नाप तौल विभाग की स्थापना 01 मई 1956 को हुई थी, हमारे राज्य में नाप तौल पद्धति का प्रचलन सीमित रूप से सर्वप्रथम मैट्रिक बांटों के रूप में 01 अक्टूबर 1958 से राज्य के चार जिलों- इन्दौर, ग्वालियर, जबलपुर तथा सीहोर में एवं 87 नियंत्रित मण्डियों व कतिपय उद्योगों में प्रारंभ किया गया। बाद में वहां उक्त प्रणाली 01 अक्टूबर 1960 से अनिवार्य रूप से लागू की गई। इसके उपरांत राज्य के शेष जिलों में नवीन बांटों का प्रचलन 01 अप्रैल 1960 से लागू किया गया, तथा 01 अप्रैल 1962 से उसे अनिवार्य किया गया। इसी प्रकार नाप, माप व क्षेत्र की इकाईयों में भी मैट्रिक प्रणाली का चलन मध्यप्रदेश में 01 अक्टूबर 1962 से लागू किया गया व 01 अप्रैल 1963 से अनिवार्य किया गया। मध्य प्रदेश में इस प्रणाली को लागू करने के लिये 'मध्य प्रदेश नाप तौल (प्रवर्तन) अधिनियम 1959' पास किया गया। इस कानून के अन्तर्गत नाप तौल उपकरणों को प्रमाणित करने के लिये व्यापक व्यवस्थाएं की गई थी। मध्यप्रदेश में उक्त अधिनियम के क्रियान्वयन हेतु नापतौल (विभाग) के अन्तर्गत विभिन्न कार्यालयों की स्थापना की गई तथा आवश्याक अधिकारियों एवं निरीक्षक नाप तौल की नियुक्ति की गई।

5. वर्तमान प्रचलित इकाई निम्न है :-

वजन/भार - किलोग्राम

तापमान - सैल्सियस

समय - सेकण्ड

लम्बाई - मीटर

क्षमता (तरल पदार्थ) - लीटर